रविवार, 4 जुलाई 2010

क्या मिला

उम्र भर आंसू बहाए क्या मिला ।
खार दामन में सजाये क्या मिला ।
वह पलट कर फिर कभी आया नहीं ,
राह में पलकें बिछाए क्या मिला ।
चाहते तो रोक सकते थे उसे ,
बंदिशें ना तोड़ पाए क्या मिला ।
जो भुला बैठा उसी के प्यार में ,
रात दिन छटपटाये क्या मिला .
प्यार में सबकुछ लुटाकर एक दिन ,
चैन से फिर रह न पाए क्या मिला ।
जिस जगह से हाथ खाली थे चले ,
सर उसी दर पर झुकाए क्या मिला ।
बेवफा की बेवफाई का बड़ा ,
बोझ कांधों पर उठाये क्या मिला .

कौन करता है मुहब्बत मुफलिसी से

कौन करता है मुहब्बत मुफलिसी से ।
जाओ करूँ शिकवा शिकायत मैं किसी से ।
है किसे फुर्सत जरा भी सोचने की ,
मौत है अब दूर कितनी जिन्दगी से ।
गमजदा क्यों आदमी लगते हमेशा ,
दुसरे हर आदमी को अजनबी से ।
दर्द सीने में छुपाकर मुस्कराना ,
हर ख़ुशी वाला सिखाता है ख़ुशी से ।
क्या बचने की रखूं उम्मीद उनसे ,
जो किनारा काटते है दूर ही से ।
मैं गुजारिश प्यार की अब न करूंगा ,
कर लिया है फैसला मैंने अभी से ।
देखकर इतना ज्यादा यूँ फरेबी ,
उठ गया अब तो भरोसा आदमी से .

शनिवार, 3 जुलाई 2010

जिन्दगी आराम से

कट रही है जिन्दगी आराम से ।

बैठ जाता हूँ जो पीने शाम से ।

भूल जाता हूँ सभी गम यकबयक ,
जाम टकराते बराबर जाम से ।
मैं मुसलसल रिंद की मानिंद ही ,
खूब पीता बेखबर अंजाम से ।
देखकर हालत मिरी कहते सभी ,
हो न हो यह तो गया अब काम से ।
याद उनको भी नहीं तारुफ़ मीरा ,
जो कभी वाकिफ रहे थे नाम से ।
हो गया बदनाम जब पीता न था ,
फर्क क्या पड़ता किसी इल्जाम से ।
वह बुलाने पर कभी आया नहीं ,
अब बुलाता है मुझे पैगाम से .

न इंकार करूँगा

तू मुझको खुशियाँ दे या गम न इंकार करूँगा ।
मैंने तुझको प्यार किया है मैं तो प्यार करूँगा ।
तेरे मेरे बीच बनाये लाख जमाना ऊँची ,
नफरत की हर खड़ी धराशायी दीवार करूँगा ।
अश्कों का दरिया कितना भी गहरा दर गहरा हो ,
मैं लेकर उम्मीद की कश्ती इसको पार करूँगा ।
तुझे रूठना गर आता है जरा रूठ कर देखो,
तुझे मनाने की हर कोशिश बारम्बार करूँगा ।
लाख छुपा ले तू परदे में अपना सुन्दर चेहरा ,
तेरी सूरत मेरे दिल में है दीदार करूँगा ।
तेरे दामन में भर दूंगा दुनिया भर की खुशियाँ ,
हर पल तेरे जीवन का जैसे त्यौहार करूँगा .

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

मुझे देखा न था .

देख कर मेरी तरफ उसने मुझे देखा न था ।
वह न जाने किसलिए मुझसे बहुत नाराज था ।
जो हमेशा मुस्कराकर ही मिला आकर मुझे ,
पर मिलेगा इस तरह से ये कभी सोचा न था ।
किस कदर है कर दिया मुझको यकायक अजनबी ,
जिन्दगी में एक पल इतना बुरा गुजरा न था ।
प्यार में बेशक नहीं दिल में जगह शक को जरा ,
क्या वजह थी जो उसे मुझ पर यकीं होता न था ।
दर्द सीने में छुपाकर मैं रखूँगा किस तरह ,
आज से पहले हुआ इतना बड़ा धोखा न था ।
रह सकेगा चैन से वह भी नहीं मेरे बिना ,
जानता हूँ दिल मेरा उसने कभी तोडा न था .



मैंने कितनी कोशिश की थी इस दिल को समझाने की

मैंने किनी कोशिश की थी इस दिलको समझाने की ।
प्यार -व्यार का चक्कर छोडो सूरत है लुट जाने की ।
मगर नसीहत भी न मानी उल्टा मुझको दन्त दिया ।
नहीं जरुरत तुम्हें बीच में बिलकुल टांग अड़ानेकी ।
सच है कहाँ चला है अब तक जोर किसी दीवाने पर ,
उसकी वही कहानी जैसे शम्मा -औ -परवाने की ।
आखिर वही हुआ जो होता अक्सर ऐसे लोगों का ,
एक कड़ी जुड़ गई नई फिर मजनूं के अफसाने की ।
सरे सपने चूर हो गए नहीं हाथ में कुछ आया ।
माजी के पन्नों पर सतरें गुजरे हुए ज़माने की ।
अब तन्हाई का आलम है दीवारें सूनी -सूनी,
खुद से बातें करता है दिल कोशिश भी मुस्काने की .

प्यार के जुर्म की ये सजा दी गई

प्यार के जुर्म की ये सजा दी गईं .दूरियां दो दिलों की बढा दी गईं ।
जिन लबों पर हंसी खेलती थी सदा ,आज खामोशियाँ हैं बिठा दी गईं ।
जिस शजर पर परिंदों का था आशियाँ ,बिजलियाँ सैकड़ों गिरा दी गईं ।
दो कदम भी जो आगे बढा ना सकें ,पांव में बेड़ियाँ यूँ लगा दी गईं ।
देखने को तरसते रहें उम्र भर ,थी दीवार ऊंची उठा दी गईं ।
लोग पालें रहें बस गलतफहमियां ,कुछ झूठी खबर थीं उड़ा दी गईं ।
बस धुंआ ही धुंआ अब दिखाई पड़े ,जो शरारे को ऐसी हवा दी गईं .