बुधवार, 16 मई 2012

प्यार की बातें

कौन करता है यहाँ अब प्यार की बातें .
जिन्दगी भर के लिए इकरार की बातें .
कौन करता है यहाँ अब प्यार की बातें .
जिन्दगी भर के लिए इकरार की बातें .
किस कदर सहमा हुआ है आदमी या रब ,
रह गया बनकर छपी अखबार की बातें .
अब नहीं फुर्सत जरा भी सांस लेने की ,
रात -दिन दौड़ा रहीं कलदार की बातें .
कौन जाने कब बदल जाए यहाँ मौसम ,
अब नहीं लगती भली अभिसार की बातें .
याद रहता है किसे किस से किया वादा ,
तोड़ देती हैं सभी कुछ हार की बातें .

वक्त बुरा है कहते रहना

रखे हाथ पर हाथ भला क्या बैठे रहना .
वक्त बुरा है वक्त बुरा है कहते रहना .
अपने भीतर जोश जगाओ उठकर बैठो ,
ऐसा भी क्या यार ग़मों को सहते रहना .
सुख दुःख तो हैं बने किनारे इस जीवन के ,
जिसकी उच्छल धार हमेशा बहते रहना .
कैसा भी हो वक्त एक सा कब रहता है ,
पर इसके ही साथ -साथ तुम चलते रहना .
एक नया सूरज फिर देखो कल निकलेगा ,
इसका तो  है काम शाम तक ढलते रहना .
आगे बढ़ कर रोक सको तो रोको उसको ,
वर्ना बैठे हाथ हमेशा मलते  रहना . 

शुक्रवार, 11 मई 2012

आज़ादी तो हो

इक पिंजरे में कैद परिंदे को उसकी आज़ादी तो हो .
हर बच्चे को उसका बचपन वृद्धों की इक लाठी तो हो .
उफन रही नदिया के बेशक नहीं किनारे होते हैं ,
लेकिन हर यौवन का अपना सच्चा  जीवन   साथी तो हो .
ऊंचे -ऊंचे महल अटारी ,ढेर कीमती दौलत के ,
नहीं सभी को मिलें ,जिन्दगी इक सीधी सादी तो हो .
माना तिल धरने को जगह  नहीं जरा सी शहरों में ,
लेकिन उजड़े हुए गाँव में बस्ती इक आबादी तो हो . 
पूंजीपति सब निगल रहे हैं हर प्राकृतिक संसाधन को ,
चाँद सितारे ,पर्वत नदिया आखिर कुछ सरकारी तो हो .
जीने में आशंका कितनी मरने में विश्वास बड़ा है ,
भविष्य अँधेरा ही हो  जाए इतनी ना बेकारी तो हो .
एक तरफ रोटी के लाले ,गेहूं सड़ता मैदानों में ,
खून पसीना धरती -पुत्रों का  बहता ना माटी तो हो.
धरे हाथ पर हाथ भला क्यों बैठे पत्थर के बुत -से तुम ,
इक दिन दुनिया सुन लेगी आवाज गले तक आती तो हो .

गुरुवार, 10 मई 2012

जिन्दगी

जिसका वेतन कट जाता है उसकी जिन्दगी नहीं कटती ,
जिसका वेतन नहीं कटता उसकी जिन्दगी कट जाती है .

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

तुम्हारी ग़ज़ल


बड़ी खूबसूरत तुम्हारी ग़ज़ल है .
मासूम दिलकश प्यारी ग़ज़ल है 
खिले फूल जिसमें मुहब्ब्बत के कितने 
बनी क्या गज़ब ये  क्यारी ग़ज़ल है .
लिखी तुमने इसमें जितनी भी बातें ,
लगता है मानों हमारी ग़ज़ल है .
 मुझे रात भर नींद आती नहीं है ,
जेहन पे रहती जो तारी ग़ज़ल है .
ग़ज़ल  तो कभी की ख़त्म हो गई पर ,
लगता है अब भी ये जारी ग़ज़ल है .
हर इक शेर पर चूम लेता हूँ इसको ,
रहती मगर फिर भी क्वांरी ग़ज़ल है 

उतर जाता है


जैसेचढ़ती   हुई नदी का ज्वार उतर जाता है .
कैसा भी हो नशा एकदिन यार उतर जाता है .
मानामैंने   लफ्ज़ छुरी से भी पैना होता है ,
लेकिन हर चाकू का देखा धार उतर जाता है .
बड़े सफीने डूब गए पर एक आदमी दरिया में ,
इक तिनके का लिए सहारा पार उतर जाता है .
तनहा यूँ तो बोझ ग़मों का बहुत बड़ा लगता है ,
लेकिन पाकर साथ किसी का भार उतर जाता है.
बजती हुई सुरीली वीणा बड़ा सुकूं देती है ,
मुश्किल तो तब होती है जब तार उतर जाता है .
चढ़ता नहीं दुबारा चाहे कितनी भी कोशिश हो ,
शख्स किसी की नजरों से इक बार उतर जाता है 

उतर जाता है


जैसेचढ़ती  हुई नदी का ज्वार उतर जाता है .
कैसा भी हो नशा एकदिन यार उतर जाता है .
माना मैंने लफ्ज़ छुरी से भी पैना होता है ,
लेकिन हर चाकू का देखा धार उतर जाता है .
बड़े सफीने डूब गए पर एक आदमी दरिया में ,
इक तिनके का लिए सहारा पार उतर जाता है .
तनहा यूँ तो बोझ ग़मों का बहुत बड़ा लगता है ,
लेकिन पाकर साथ किसी का भार उतर जाता है.
बजती हुई सुरीली वीणा बड़ा सुकूं देती है ,
मुश्किल तो तब होती है जब तार उतर जाता है .
चढ़ता नहीं डूबा चाहे कितनी भी कोशिश हो ,
शख्स किसी की नजरों से इक बार उतर जाता है