सोमवार, 2 अगस्त 2010

रामायण -11

( ४१ )
मुकद्दर आजमाओ आज अपना शूरमाओ तुम ,
ज़रा हम भी तो देखें किस बहादुर वीर में है दम ,
सलाए आम है आओ बढ़ो अब ठोक कर तुम हनम ,
दिखाओ अपनी शैजोरी फतह के गाड़ दो परचम ,
पड़ेगी उस में जयमाला जिस गर्दन में न ख़म होगा ,
वही ले जाएगा सीता कि जिसके दम में दम होगा ।
( ४२ )
बहादुर शूरमां इक इक कर मुकद्दर आजमाता था ,
वही चित हो गया जो कल अकड़ अपनी दिखाता था ,
उसी की हो गई सुबकी जो आँखों पर बिठाता था ,
धनुष उन से तो सच पूछो उठाये से न उठता था ,
कोई तो दौड़ता और भागता और कोई चित लेटे,
हवस थी ये धनुष तो अब किसी भी तौर से टूटे ।
( ४३ )
सभी ने अपनी हिम्मत के मुताबिक़ जोर दिखलाया ,
पसीने आ गए इक को कोई तो देखकर दौड़ा ,
धनुष को देखते ही इक बहाना कर भागा था ,
गिरा इक चारपाई से कोई सोते में चौंक उठा ,
धनुष क्या था मुसीबत थी बला थी एक आफत थी ,
इसी से सब बिदकते थे यही तो इक क़यामत थी ।
( ४४ )
जनक ने जब देखा खून आँखों में उतर आया ,
वह बोले तिलमिलाकर मैं बुलाकर तुमको पछताया ,
न कोई शूरमां भी इस धनुष को तो उठा पाया ,
मेरी बेटी क्वांरी ही रहे तो है बहुत अच्छा ,
तुम्हारी कौम पर तुफ्र है तुम्हारे नाम पर तुफ्र है ,
तुम्हारी वीरता पर और तुम्हारे काम पर तुफ्र है .

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह सुंदर शब्द प्रवाह और सशक्त शब्द प्रयोग.

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  2. बढ़िया प्रवाहमयी है...

    मुकद्दर आजमाते था , को र मुकद्दर आजमाता था ,

    कर लिजिए.

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