रविवार, 11 जुलाई 2010

अपना दर्द सुनाने निकले

औरों को दुःख देने वाले अपना दर्द सुनाने निकले ।
घेर लिया जब अंधियारों ने दीपक बुझे जलाने निकले ।
औरों के किस्से चटखारे ले लेकर जो कहते थे ,
उनके अपने घर से कितने मजेदार अफ़साने निकले ।
तन्हाई से घबराए तो भीड़ में जाकर बैठ गए ,
जब लोगों के दिल में झाँका अन्दर से वीराने निकले ।
चिंगारी को खुद भड़का कर शोलों में तब्दील किया ,
लपटों ने जब घेर लिया घर बाहर आग बुझाने निकले ।
भोली भाली सूरत लेकर जो औरों को ठगते थे ,
इक दिन ऐसा धोखा खाया थाने रपट लिखाने निकले ।
सबकी नाव डूबने वाले वक्त आखिरी जब आया तो ,
इक कागज़ की कश्ती लेकर खुद को पार लगाने निकले ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. "तन्हाई से घबराए तो भीड़ में जाकर बैठ गए ,
    जब लोगों के दिल में झाँका अन्दर से वीराने निकले ।"


    bahut badhiya ji.....

    kunwar ji,

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