गुरुवार, 15 जुलाई 2010

ना जाने क्यों

ना जाने क्यों मुझे आज तक चन्द्रमा /
प्रेयसी का मुखड़ा न लगा /
मुझे तो बस नाक बहाते /भूख से बिलबिलाते /
नंग -धडंग बच्चे को बहलाने का /
रोटी का टुकड़ा सा लगा ।
मैं ठंडी -ठंडी शीतल बयार में /
कोई रोमांटिक गीत न गुनगुना सका /
क्यों कि रिक्शे में बैठी चार सवारियों को /
जून की चिलचिलाती धूप में /
खींचते हुए रिक्शा चालक का /
यह हवा आँचल न बन सकी ।
मैं सावन की रिमझिम फुहारों में /
भीगती हुई नवयौवना का सौंदर्य /
ना निहार सका /क्यों कि मैं देख रहा था /
बरसात की कलि रात /
और झ्प्दी में भरा पानी /
पानी को हथेलियों से /
उलीचती औरतें ।
मैं अपनी बीवी /प्रेमिका की आँखों में /
तिरता मौन आमंत्रण न पढ़ सका /
क्यों कि मैं पढ़ रहा था /
एक युवती और उसके चारों ओर फैली /
विवशताए ,बिडम्बनाएँ ।
मैं अपने चारों ओर इर्द गिर्द व्यंग /
वक्त्रोक्तियों /घृणा /तिरस्कार को मसूस न कर सका /
क्यों कि मैं महसूस कर रहा था फर्क /
चारपाई पर खांसती ,कराहती बूढ़ीमाँ की /
आवाज में तथा पलंग पर /
बगल में लेटी बीवी के फुसफुसाते स्वरों में .

1 टिप्पणी:

  1. बहुत संवेदनशील रचना ....

    कमेंट्स की सेटिंग से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें... लोगों को टिप्पणी देने में सरलता होगी

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